मस्तूरी। निजी स्कूलों में शिक्षा से अधिक अब ड्रेस और यूनिफॉर्म का कारोबार चर्चा का विषय बनता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के पालकों का आरोप है कि अधिकांश निजी स्कूल हर दो से तीन वर्ष में ड्रेस का डिजाइन या रंग बदल देते हैं। इससे पहले से खरीदी गई यूनिफॉर्म बेकार हो जाती है और पालकों को दोबारा नई ड्रेस खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।इतना ही नहीं, अब स्कूलों ने नियमित यूनिफॉर्म के अलावा ‘हाउस शर्ट’ के नाम पर भी अलग ड्रेस अनिवार्य कर दी है। इसके लिए भी पालकों से अतिरिक्त राशि वसूली जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि सामान्य पढ़ाई के लिए एक यूनिफॉर्म पर्याप्त है, फिर अलग-अलग रंग की हाउस शर्ट और अन्य ड्रेस अनिवार्य करने का औचित्य समझ से परे है।पालकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन कुछ चुनिंदा दुकानों से ड्रेस खरीदने का दबाव बनाता है, जहां बाजार की तुलना में कहीं अधिक कीमत वसूली जाती है। इससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह बिगड़ जाता है।ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि यदि हर दो-तीन साल में ड्रेस बदलने की कोई शैक्षणिक आवश्यकता नहीं है, तो यह केवल आर्थिक लाभ कमाने का माध्यम बनता जा रहा है। कई पालकों ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे खेल में कमीशनखोरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन इस व्यवस्था पर प्रभावी निगरानी क्यों नहीं कर रहे हैं। यदि निजी स्कूलों की मनमानी पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो हर वर्ष हजारों परिवार अनावश्यक आर्थिक बोझ उठाने को मजबूर होंगे।
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