डीएससी संचालन, जियो-ट्रैकिंग और पंचायत राशि जारी करने की प्रक्रिया को लेकर जनप्रतिनिधियों ने की जांच की मांग
मस्तूरी। जनपद पंचायत मस्तूरी की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में है। वाहन चालक को कार्यालयीन कार्यों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने और ग्राम पंचायतों की राशि जारी करने में उपयोग होने वाले डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (डीएससी) के संचालन को लेकर जनप्रतिनिधियों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि डीएससी, जो संबंधित सचिव और सरपंच के पास सुरक्षित रहना चाहिए, वह एक बाबू के पास रखा जाता है और उसी के माध्यम से पंचायतों की राशि जारी की जाती है। उनका कहना है कि यदि ऐसा हो रहा है तो यह पंचायतों की वित्तीय व्यवस्था और डिजिटल सुरक्षा दोनों के लिए चिंताजनक विषय है। मामले की निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की गई है।
कार्यालयीन कार्यों में ड्राइवर की भूमिका पर उठे सवाल
जानकारी के अनुसार, जनपद पंचायत मस्तूरी के सीईओ जे.आर. भगत के साथ वाहन चलाने वाले ड्राइवर को कार्यालय में बाबू की तरह कार्य कराया जा रहा है। आरोप है कि जनपद में पहले से बाबू पदस्थ होने के बावजूद वाहन चालक को महत्वपूर्ण कार्यालयीन जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं।
इसी के साथ उसे जिला पंचायत, जनपद पंचायत और ग्राम पंचायतों से जुड़े जियो-ट्रैकिंग कार्यों का प्रभार दिए जाने की बात भी सामने आई है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जियो-ट्रैकिंग कार्यों में स्थल पर जाकर वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया जाना चाहिए, जबकि संबंधित कार्य कार्यालय में बैठकर किए जाने की शिकायतें मिल रही हैं।
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पुराने मामलों की याद दिला रहे जनप्रतिनिधि
मामले को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जनपद पंचायत में पूर्व में कथित फर्जी भुगतान और डीएससी के दुरुपयोग से जुड़ा मामला चर्चा में रह चुका है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि उस प्रकरण में लाखों रुपये की राशि कथित रूप से गलत तरीके से जारी किए जाने के आरोप सामने आए थे।
उनका कहना है कि पूर्व की घटनाओं से सबक लेने के बजाय यदि भुगतान और डिजिटल प्रणाली में फिर से अनियमितताएं हो रही हैं तो इसकी विस्तृत जांच आवश्यक है।
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राशि जारी करने में प्रतिशत मांगने का आरोप
कुछ जनप्रतिनिधियों ने यह भी आरोप लगाया है कि पंचायतों की राशि जारी करने के नाम पर एक से दो प्रतिशत तक राशि लिए जाने का दबाव बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला होगा।
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निष्पक्ष जांच की मांग
जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने पूरे मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि पंचायतों में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
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