रघु यादव मस्तूरी
अच्छी मजदूरी का लालच देकर दूसरे राज्यों में ले जाए जा रहे ग्रामीण, पंचायत से श्रम विभाग तक को भनक नहीं; मजदूरों की सुरक्षा कौन करेगा?
पचपेड़ी। मस्तूरी विकासखंड के पचपेड़ी थाना क्षेत्र में मजदूरों के लगातार हो रहे पलायन ने एक बार फिर ग्रामीण रोजगार, मजदूरों की सुरक्षा और जिम्मेदार विभागों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्र से रोजाना बड़ी संख्या में मजदूरों को बसों में भरकर महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में काम दिलाने के नाम पर ले जाए जाने की बात सामने आ रही है। इसके बावजूद मजदूरों के इस आवागमन की जानकारी ग्राम पंचायत, श्रम विभाग और स्थानीय पुलिस तक किस हद तक पहुंच रही है, यह जांच का विषय है।
मजदूरी का लालच, पांच-छह महीने घर से दूर रहने की मजबूरी
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसर और आर्थिक तंगी के कारण कई परिवार दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाने को मजबूर हैं। बताया जा रहा है कि श्रमिकों को अच्छी मजदूरी दिलाने का भरोसा देकर लेबर सरदार और बिचौलिये उन्हें एकत्रित करते हैं तथा बसों के माध्यम से दूसरे प्रदेशों में भेजते हैं। कई मजदूर पांच से छह महीने तक अपने परिवार और गांव से दूर रहकर काम करते हैं।सवाल यह है कि इन मजदूरों को किस ठेकेदार दलाल के माध्यम से, किन शर्तों पर और किस कार्यस्थल पर भेजा जा रहा है? क्या उनकी मजदूरी, रहने की व्यवस्था, सुरक्षा और घर वापसी की शर्तें पहले से तय होती हैं? यदि किसी मजदूर के साथ दूसरे राज्य में धोखाधड़ी, मजदूरी भुगतान में देरी या शोषण की स्थिति बनती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?मजदूरों के लगातार हो रहे पलायन के बीच यह भी सवाल उठ रहा है कि ग्राम पंचायतों और श्रम विभाग के पास पलायन करने वाले श्रमिकों का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड है या नहीं। यदि मजदूर रोजाना समूहों में दूसरे राज्यों के लिए रवाना हो रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभागों की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं? इस संबंध में संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया और आधिकारिक आंकड़े सामने आना जरूरी है।

बस स्टैंडों से हो रहा आवागमन, निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल
क्षेत्र के बस स्टैंडों से मजदूरों को बसों में ले जाने की गतिविधियों को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा है। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि श्रमिकों को ले जाने वाले ठेकेदारों और लेबर दलालों की पहचान क्या है, उनके पास आवश्यक दस्तावेज हैं या नहीं तथा मजदूरों को सुरक्षित और नियमानुसार काम पर भेजा जा रहा है या नहीं।स्थानीय पुलिसकर्मियों और लेबर दलालों के बीच कथित मिलीभगत को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इस संबंध में किसी भी प्रकार की मिलीभगत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इस सत्यता के लिए हमारी टीम जमीनी स्तर पर खबर कवरेज करने के लिए लगी हुई है संदेह पदस्थ लोगों की जानकारी मिलती है और पुष्टि होती है तो बाकायदा फोटो और नाम सहित खबर प्रकाशित की जाएगी, इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना आवश्यक है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
हर साल दोहराती है पलायन की पीड़ा
मजदूरों का पलायन केवल रोजगार का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। परिवार के कमाऊ सदस्य के महीनों बाहर रहने से बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की जिम्मेदारी और घरेलू जीवन भी प्रभावित होता है। वहीं, दूसरे राज्यों में अनजान कार्यस्थलों पर जाने वाले श्रमिकों के लिए शोषण और बकाया मजदूरी जैसी समस्याओं का खतरा बना रहता है।पचपेड़ी थाना क्षेत्र में मजदूरों के पलायन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए जिला प्रशासन, श्रम विभाग और पुलिस विभाग को संयुक्त रूप से जांच करनी चाहिए। पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या, उन्हें ले जाने वाले ठेकेदारों की पहचान, कार्यस्थलों का विवरण और मजदूरी की शर्तों की जानकारी जुटाई जानी चाहिए। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने और जरूरतमंद श्रमिकों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने पर भी ध्यान देना जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ग्रामीण मजदूर रोजाना बसों में सवार होकर दूसरे राज्यों की ओर जा रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा, अधिकारों और रोजगार की शर्तों की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है अब जरूरी है कि संबंधित विभाग केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहें, बल्कि जमीनी स्तर पर जांच कर मजदूरों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करें।
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